Rahim Ke Dohe [Popular Dohe हिंदी अनुवाद-2020]

Rahim Ke Dohe 20+ [Popular Dohe इन हिंदी अर्थ सहित]

रहीम : संक्षिप्त जीवन परिचय

रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। इनका जन्म 1556 में लाहौर (वर्तमान में पाकिस्तान) में हुआ था। इनके पिता बैरम खाँ मुगल सम्राट अकबर के संरक्षक थे।  किन्हीं कारणोंवश अकबर बैरम खाँ से रुष्ट हो गया था और उसने बैरम खा पर विद्रोह का आरोप लगाकर हज करने के मक्का भेज दिया। मार्ग में उसके शत्रु मुबारक खाँ ने उसकी हत्या कर दी।

बैरम खाँ की हत्या के पश्चात् अकबर ने रहीम और उनकी माता को अपने पास बुला लिया और रहीम की शिक्षा की समुचित व्यवस्था की।  प्रतिभासम्पन्न रहीम ने हिन्दी, संस्कृत, अरबी, फारसी, तुर्की आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।  इनकी योग्यता को देखकर अकबर ने इन्हें अपने दरबार के नवरत्नों में स्थान दिया।  वे अपने नाम के अनुरूप अत्यन्त दयालु प्रकृति के थे। मुसलमान होते हुए भी ये भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे।

अकबर के मृत्यु के पश्चात जहाँगीर ने इन्हें चित्रकूट में नजरबन्द कर था। केशवदास और गोस्वामी तुलसीदास से उनकी अच्छी मित्रता थी। इनका अन्तिम समय विपत्तियों से घिरा रहा और सन 1627 ईस्वी में मृत्यु हो गयी।

Rahim Ke Dohe
Rahim Ke Dohe

1.रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून |

पानी गये न उबरहि मोती मानुष चून ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि पानी जीवन और प्रकृति से प्राप्त होने वाले अन्य पदार्थों के लिये बहुत आवश्यक है | पानी के बिना सब कुछ व्यर्थ है | व्यक्ति को पानी (इज्जत , मान -प्रतिष्ठा) रखना चाहिये | यदि उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है, तो उसका जीवन व्यर्थ है | ठीक वैसे ही जैसे यदि मोती में चमक न हो, तो उसका कोई मूल्य नहीं होता व पानी के अभाव में आटा निर्थक है |

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2 .गौरि गौरि रहिमन तब तक ठहरिये, मान मान सम्मान |

घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करिय पयान ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि व्यक्ति को किसी भी जगह तब तक ठहरना चाहिये जब तक वहाँ उसका मान -सम्मान हो और जैसे ही व्यक्ति का मान उस स्थान पर घटने लगे उसे उस स्थान को तुरंत छोड़ देना चाहिये |

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3 .भावी काहु ना दही, भावी दह भगवान |

भावी ऐसी प्रबल है, कहि रहीम यह जान ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि भावी (प्रारब्ध, होने) को कौन टाल सकता है | इस भावी के द्वारा कौन नहीं जला और किसे दु:ख नहीं पहुंचा | इसने तो भगवान राम तक को नहीं छोड़ा | उन्हें भी इस होने के वशीभूत होकर वन -वन भटकना पड़ा | इसलिये कहा जाता है कि होनी बड़ी बलवान होती है | इस बात को अच्छी तरह समझ लो |

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4 .भावी या उनमान की, पंडव बनहि रहीम |

 जदपि गौरि सुनी बांझ है, बरु है सम्भु अजीम ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि होनी की प्रबलता की सिद्धि इस बात से होती है कि पाण्डुपुत्र (पाण्डव) अत्यन्त शक्तिशाली थे | श्रीकृष्ण भी उनके साथ लेकिन फिर भी उन्हें बनवास में कष्ट सहना पड़ा |अन्ततः कृष्ण की सहायता से उन्हें विजय प्राप्त हुई | दूसरा उदाहरण यह है कि माना जाता है कि पार्वती सबको सुयोग्य वर और संतान प्राप्ति का वर देती हैं | लेकिन उनके पति शिव स्वयं सामर्थ्यवान और बलवान होने पर भी वह बांझ कहलाती हैं | अंततः शिव की कृपा से ही उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुई |

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5.राम ना जाते हरिन संग, सीय न रावण साथ |

जो रहीम भावी कतहुं, होते आपने हाथ ||

व्याख्या :- रहीम ने अपने इस दोहे के जरिये भी भाग्य की महत्ता सिद्ध करते हुए कहते हैं कि यदि भाग्य पर किसी का जोर चलता, तो श्रीराम जो भगवान विष्णु के अवतार हैं वन में सोने के हिरण के पीछे क्यों जाते और लंका का राजा रावण सीता का हरण क्यों करता ? यह सब भाग्य का ही तो खेल है |

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6 . ससि की शीतल चांदनी, सुन्दर सबहिं सुहाय |

लगे चोर चित में लटी, छटि रहीम मन आय ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि यह मनुष्य का स्वभाव है की एक ही समय में किसी को कोई भी वस्तु अच्छी लगती है , तो किसी को कोइ। जैसे चन्द्रमा की शीतल चाँदनी जो सबको अच्छी लगती है , वही चन्द्रमा की चांदनी चोरों के कार्यों में बाधा उत्पन्न करती है इसलिए उन्हें वह नहीं सुहाती ; लेकिन जब उसकी चांदनी घटने लगती है , तो वही उन चोरों को अच्छी लगने लगती हैं।

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Rahim Ke Dohe[हिंदी अनुवाद]-2020
Rahim Ke Dohe[हिंदी अनुवाद]-2020

Rahim Ke Dohe 20+ [Popular Dohe इन हिंदी अर्थ सहित]

7 .रहिमन मोहि न सुहाय, अमी पियावै मान बिनु।

बरू बिष देय बुलाय, मान सहित मरिबो भलो।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि यदि कोई बिना मान-सम्मान के अमृत भी दे, तो भी वह नहीं पीना चाहिये और यदि कोई सम्मान पूर्वक विष भी दे, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।  रहीम का मन्ना है की अपमान के  साथ अमृत पीने से अच्छा सम्मानपूर्वक विष पीकर मृत्यु को ग्रहण  उत्तम है।

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8. रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीझे नहीं।

तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझे नहीं।।

किसी के भी स्वभाव को भला कैसे बदला जा सकता है। इसी बात की पुष्टि करते हुए रहीम कहते हैं की पत्थर पानी में आवस्य डूबता है ; परन्तु पानी के साथ रहकर भी वह मुलायम नहीं होता। इसी  प्रकार मूर्खों के आगे कितनी भी ज्ञान पूर्वक बातें की जाय  उसे कभी कुछ नहीं समझ में आता।Rahim Ke Dohe, 

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9.होत कृपा जो बड़ेन की , सो कदाचि भट जाए।

तो रहीम मरिबो भलो , यह दुःख सहो न जए।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं की यादी बड़ों का अपमान ,प्यार, दुलार मिले , तो जीवन सुखद हो जाता है। परन्तु यदि किसी कारन से उनका प्यार न मिले , तो जीवन दुःखमयी  हो जाता है इससे अछा  तो मर जाना है क्योंकि यह दुःख असहनीय है।Rahim Ke Dohe, 

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10.अनुचित बचन न मानिये ,जदपि गुरायसु गाढ़ी।

है रहीम रघुनाथ ते , सुजस भरत को को बाढ़ि।।

व्याख्या :- रहीम ने मनुष्य को सही गलत की पहचान कराई है और वह कहते हैं कि कभी गुरुजन कभी अनुचित आज्ञा दे , तो मनुष्य को पहले सोच विचार कर लेना चाहिए वह उसे माने की ना माने। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए राम बनवास चले गए जिससे की उन्हें यश की प्राप्ति हुई परन्तु यह सभी जानते हैं कि राम से अधिक यश भरत को मिला क्योंकि भारती नई वस्तुस्थिति की परख करते हुए अयोध्या की राजगद्दी स्वीकार  नहीं की।

[su_divider]Rahim Ke Dohe, 

11.अंजन दियो तो किरकिरी ,सुरमा दियो न जाय।

जिन आँखिन सों  हरि लख्यो ,बलि -बलि जाए  ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि मैंने जब से हरि का दर्शन किया है तब से मुझे आँखों में सुरमा लगाने पर किरकिरी सी लगने लगती है क्योंकि आँखों में हरि का वास है , तो उसमें सुरमा का कैसे वास हो सकता है, इसलिए मैं अपने नेत्रों पर बलिहारी जाता हूँ|Rahim Ke Dohe, 

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12 . आप न काहू काम के, डार पात फल फूल |

औरन को रोकत फिरै, रहिमन पेड़ बबूल ||

व्याख्या :- रहीम ने अपने इस दोहे में दुष्टों के स्वभाव के बारे में बताया है और इसके लिये बबूल के पेड़ का उदहारण देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार बबूल का पेड़ न स्वयं उपयोगी होता है और न ही किसी दूसरे के लिये | इसके फल -फूल,पत्ते शाखायें, जड़े  आदि सभी बेकार होती हैं | इसका एक अवगुण यह भी है कि वह अपने नजदीक के सभी पेड़ – पौधों को भी नहीं फलने – फूलने देता | अगर कोई इस पेड़ के पास से जाता है, तो उसे उसके कांटे चुभ जाते हैं | ठीक उसी प्रकार दुष्टों का स्वभाव होता है |

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13 . कहि रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहु रीति|

बिपति – कसौटी जे कसे, सोइ सांचे मीत ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि जब व्यक्ति के पास धन – दौलत रहती है तो अनेक लोग मित्रता का दावा करते हैं लेकिन जब वह निर्धन हो जाता है तब वह उससे मुँह फेर लेते हैं | अतः सच्चे मित्र वही होता है जो संकट की घड़ी में भी मित्रता बनाये रखें |Rahim Ke Dohe, 

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14 . रहिमन तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानी |

पर बस परे परोस बस, परे मामिला जनि ||

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति कोअपने हितैसी और अहितैषी की तीन प्रकार से पहचान करनी चाहिए। पहला जब वह पराये के अधीन हो , पड़ोस कैसा है और विवाद  आदि उत्पन होने पर इन्ही तीन तरीकों से ज्ञात हो जाता है कि व्यक्ति सच्चा हितैषी कौन है या कौन नहीं।Rahim Ke Dohe, 

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15. अरज गरज मैंने नहीं , रहिमन ये जान चाहिर।

रिनिया राजा मांगता , काम अतुरी नारी।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं की ऋण लेने वाला , राजा , भिखारी तथा कामवासना से व्याकुल हुई स्री।  ये चार ऐसे हैं जिन पर डांट – फटकार अनुनय – विनय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।  ये सदैव अपने ही मन की करते हैं।Rahim Ke Dohe, 

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16. खैर , खून ,खासी , बैर , प्रति मदपान।

रहिमन दबे ना दबैं ,जानत सकल जहाना।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं कि खैर (कुशलता), खून (हत्या) , खांसी , बैर (दुश्मनी) ख़ुशी (प्रसन्ता), प्रीति (प्रेम), मद्यपान अर्थात शराब  ये सब छुपाने से नहीं छुपते। ये साडी दुनिया जानती है।Rahim Ke Dohe, 

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रहीम के दोहे [हिंदी अनुवाद]-2020
रहीम के दोहे [हिंदी अनुवाद]-2020

17. अधम बचन काको फल्यो , बैठी ताड़ की छांह।

रहिमन काम न आय है  ये नीरस जन  मांह।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं की नीच की बोली हुई बात कभी फलदायी नहीं होती।

ठीक उसी प्रकार जैसे ताड़  के पेड़ की छाया में बैठने से कोई लाभ नहीं होता है।

ये दोनों ही निरर्थक होते हैं।Rahim Ke Dohe, Rahim Ke Dohe,

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18. कमला थिर न रहीम कहि , यह जानत सब कोय।

पुरूष पुरातन की वधु, क्यों न चंचला होय।।

व्याख्या :- रहीम इस दोहे में लक्ष्मी की अस्थिरता का कारण  बताते हुए कहते हैं कि यह सभी जानते हैं कि लक्ष्मी स्थिर नहीं है।  इसका कारन यह है कि लक्ष्मी भगवान  विष्णु की पत्नी है तथा विष्णु को पुराण पुरुष कहते है ; क्योंकि विष्णु पुराण पुरूष होने से वृद्ध हैं तथा लक्ष्मी यौवना हैं।  अतः यदि पुरुष वृद्ध हो जाय तथा उसकी पत्नी यौवना हो , तो वह भटकेगी ही।Rahim Ke Dohe, 

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19. रहिमन ओछे नरन ते , होत बड़े नहीं काम।

मढौ दमामो न बनै , सौ चूहे के चाम।।

व्याख्या :- रहीम कहते है कि छोटे लोगों से बड़े काम होना असम्भव  है क्योंकि उनकी इतनी सामर्थ्य नहीं होती। ठीक वैसे ही जैसे नागदा बनाने के लिए यदि सौ चूहों का चमड़ी का उपयोग किया जाय तब भी वह बेकार होता है क्योंकि नगाड़ा  बनाने के लिए चूहे से भी बड़े जीव की चमड़ी की आवश्कता होती है।Rahim Ke Dohe, 

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20. कैसे निबिहैं निबल जन,करि सबलन सों गैर।

रहिमन बसि सागर बसि सागर बिषे , करत मगर सों बैर।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं की निर्बल व्यक्ति अपने से बलवान व्यक्ति से बैर करेगा , तो उसके अस्तित्वा को ही खतरा पैदा हो जायेगा। ठीक उसी प्रकार जैसे समुद्र में रहकर मगरमच्छ में बैर नहीं किया जा जा सकता।Rahim Ke Dohe, 

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21. थोथे बदल कवर के , ज्यों रहीम घहरात।

धनि पुरुष निर्धन भये , करैं पछली बात।।

व्याख्या :- रहीम अपने इस दोहे में प्राकृतिक का सुन्दर चित्रण करते हुए कहते हैं की जैसे क्वार के बादल गरजते तो बहुत हैं लेकिन बरसते नहीं हैं। उसी प्रकार धनि से निर्धन बने पुरूषों की भी स्थिति होती। वह अपने बीते  दिनों की बातें लोगों से कहता फिरता है।Rahim Ke Dohe, 

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22. ससि , सुकेस , साहस ,सलिल ,मान सनेह रहीम।

बढ़त – बढ़त बढ़ी जात  हैं, घटत – घटत घाटी सीम।।

व्याख्या :- संसार में ऐसा कुछ भी नहीं हैं ,जो स्थिर है इसी तथ्य को उजागर करते हुए रहीम कहते हैं कि सूर्य – चन्द्रमा , सुन्दर केश , साहस, पानी ,सम्मान प्रेम कभी एक जैसे नहीं रहते।  ये बढ़ते घटते रहते हैं अर्थात ये बढ़ते हैं , तो अत्यधिक बढ़ जाते हैं और घटते हैं तो बिलकुल ही घट जाते हैं।Rahim Ke Dohe, 

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23.समय पाय फल होत है समय पाय झरि जाय।

सदा रहे नहीं एक -सी , का रहीम पछिताय।।

व्याख्या :- रहीम कहते हैं की समय आने पर ही पेड़ों  पर फल लगते हैं और समय ख़त्म होने पर झड़ जाते है। समय परिवर्तनशील है। यह कभीं भी एक सम्मान नहीं होता। समय समय पर जीवन में उतर चढ़ाव आते रहते हैं।Rahim Ke Dohe, 

 

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दोस्तों हम उम्मीद करते हैं कि यह दोहा पसंद आया होगा। अगर आपको यह rahim ke dohe पसंद आया होगा तो तो अपने दोस्तों के पास sher करना भूलें। हमने इस दोहे को सरल भाषा में अनुवाद करने का प्रयाश किया है ताकी छोटे बच्चे भी आसानी से समझ जाए। Rahim Ke Dohe, 

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